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करवा चौथ पर शिव-पार्वती जी की पूजा करने के साथ चंद्र देव को अर्घ्य देने के बाद व्रत खोला



हिंदू पंचांग के अनुसार, हर साल कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को करवा चौथ का पर्व मनाया जाता है। इस दिन सुहागिन महिलाएं पति की लंबी आयु और सुखी वैवाहिक जीवन के लिए निर्जला व्रत रखती हैं। करवा चौथ पर शिव-पार्वती जी की पूजा करने के साथ चंद्र देव को अर्घ्य देने के बाद व्रत खोला जाता है। विधि-विधान से पूजा करने के साथ करवा चौथ का कथा पढ़ना लाभकारी माना जाता है। मान्यता है कि करवा चौथ पर जो महिला कथा पढ़ती है या फिर सुनती है, तो उसे शुभ फलों की प्राप्ति होती है।


सेक्टर 20 के गुग्गा माड़ी मंदिर मै भी पंडित जी द्वारा व्रत कथा सुनाई गई। जहां काफी संख्या मै महिलाएं पहुँची हुई थी।


करवा चौथ की कथा

बहुत पुरानी बात है कि एक नगर में एक साहूकार रहता था। जिसके साथ बेटे और एक बेटी थी। बेटी का नाम करवा था। अपनी प्यारी बेटी की धूमधाम से शादी करके उसे ससुराल के लिए विदा कर दिया। भाई अपनी बहन से बहुत ही प्यार करते थे। एक बार की बात है कि बहन अपने ससुराल से मायके आई हुई थी। जहां उसने अपनी भाभियों के साथ मिलकर करवा चौथ का व्रत रखा। लेकिन शाम होते-होते वह भूख से व्याकुल हो उठी। सभी भाई को उसकी ये हालत देखी नहीं गई, क्योंकि चंद्रमा निकलने पर अभी काफी समय था। उन्होंने अपनी बहन से पानी पीने के लिए कहा, तो उसने कहा कि चांद निकलने के बाद ही वह खा पी सकती हैं। ऐसे में सभी भाई काफी व्याकुल हो गए। ऐसे में सबसे छोटे भाई को रहा नहीं गया। उसने दूर पीपल के पेड़ पर एक दीपक जलाकर चलनी की ओट में रख दिया। दूर से देखने पर वह चांद जैसा प्रतीत हो रहा था। इसके बाद भाई अपनी बहन को बताता है कि देखो चांद निकल आया है, तुम उसे अर्घ्य देकर भोजन कर सकती हो। बहन ने खुशी से चांद को देखा और उसे अर्घ्य दे दिया।

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