• globalnewsnetin

प्रधानमंत्री और गृहमंत्री के पास जम्मू-कश्मीर में पंजाबी की आधिकारिक भाषा के रूप में बहाली का मुद्दा


चंडीगढ़ (गुरप्रीत) : शिरोमणी अकाली दल ने केंद्र शासित प्रदेश जम्मू और कश्मीर में पंजाबी की बहाली का मुददा प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री श्री अमित शाह के साथ साथ संसद में भी उठाने का फैसला किया है।

पार्टी की एक उच्चस्तरीय मीटिंग में जिसकी अध्यक्षता सरदार सुखबीर सिंह बादल ने की इसका निर्णय लिया गया है। यह तय हुआ है कि पार्टी पंजाबी भाषा को इस सूची में शामिल करने की मांग करते हुए जम्मू-कश्मीर की उर्दू, कश्मीरी डोगरी, हिंदी और अंग्रेजी राजभाषा बनाने की मांग वाले कानून का मसौदे में बदलाव की मांग करेगी।

इस अवसर पर अकाली दल अध्यक्ष ने कहा कि जम्मू और कश्मीर में रहने वाले सिखों और पंजाबियों के साथ साथ दुनिया भर में पंजाबियों के साथ भेदभावपूर्ण रवैये के कारण पंजाबियों में बीच व्यापक असंतोष है, जिसमें पंजाबी को उसके प्रशासन द्वारा जम्मू और कश्मीर की आधिकारिक भाषा के रूप में रखा गया था। उन्होने कहा कि पंजाबी को जम्मू और कश्मीर के राज्य के पूर्ववर्ती संविधान में राजभाषा का दर्जा दिया गया था और वर्तमान व्यवस्था में भी इस दर्जे को बरकरार रखा जाना चाहिए।

मीटिंग में बलविंदर सिंह भूंदड़, प्रोफेसर प्रेम सिंह चंदूमाजरा, सिकंदर सिंह मलूका और डॉ. दलजीत सिंह चीमा सहित अन्य वरिष्ठ नेताओं ने कहा कि जम्मू-कश्मीर में बीस लाख से अधिक लोगों ने पंजाबी भाषा बोलते हैं और पंजाबियों की केंद्र शासित प्रदेश की तीन प्रतिशत से अधिक की आबादी है। उन्होने कहा कि पंजाबी का जम्मू-कश्मीर में हमेशा विशेष दर्जा रहा है।

सरदार सुखबीर सिंह बादल ने पार्टी नेताओं को आश्वासन दिया कि वह इस मुददे को केंद्र के साथ मिलकर उठांएगें और साथ ही इस मुददे को संसद में भी उठाएंगे ताकि पंजाबी भाषा की उचित स्थिति को बहाल किया जा सके। उन्होने कहा कि पंजाबी खालसा राज के समय से ही जम्मू-कश्मीर की संस्कृति में समाहित थी और इसे शिक्षा के माध्यम के रूप में व्यापक रूप से इस्तेमाल किया जाता था। ‘पंजाबी 1981 तक जम्मू-कश्मीर में उर्दू जैसा अनिवार्य विषय था। अकाली दल अध्यक्ष ने कहा कि जम्मू-कश्मीर में इसे राजभाषा के रूप से निकाल देने का कोई भी प्रयास राज्य में सिख समुदाय की पहचान पर हमला है।

सरदार बादल ने कहा कि शिरोमणी अकाली दल ने करोड़ों पंजाबियों की मातृभाषा के लिए न्याय की लड़ाई में हमेशा आगे रहे हैं और यह सुनिश्चित करना जारी रखेगें कि पंजाबी भाषा के साथ कोई भेदभाव न किया जाए। उन्होने कहा कि उन्होने दुनिया भर में पंजाबियों की भावनाओं से जम्मू-कश्मीर प्रशासन को अवगत करवाया था और यह भी बताया था कि इस तरह के फैसलों से केवल उन लोगों को उकसाएगा जोकि देश में शंाति और सांप्रदायिक सौहार्द्र को बिगाडने का काम कर रहे थे। उन्होने कहा कि पंजाबी को राजभाषा के रूप में हटाने का कदम संविधान की उस भावना के खिलाफ था जिसके संस्थापक भारत को बहुधार्मिक, बहुसांस्कृतिक और बहुभाषी राष्ट्र के रूप में देखना चाहते थे।

 Global Newsletter

  • Facebook
  • social-01-512
  • Twitter
  • LinkedIn
  • YouTube