लॉक डाउन में कैसे और क्यों मनाएं निर्जला एकादशी ?

चंडीगढ़ (अदिति) मदन गुप्ता सपाटू, ज्योतिर्विद्, का कहना है कि प्रत्येक वर्ष 24 एकादशियां पड़ती हैं। अधिक मास अर्थात मलमास की अवधि में इनकी संख्या 26 हो जाती हैं। ज्येष्ठ मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी को निर्जला एकादशी कहा जाता हैै। इस साल यह एकादशी 2 जून ,मंगलवार  को पड़ रही है। वास्तव में यह एकादशी पहली जून सोमवार की  दोपहर 2 बजकर 57 मिनट पर आरंभ हो चुकी है और मंगलवार दोपहर  12 बज कर 05 मिनट तक रहेगी।  यह व्रत एकादशी के सूर्योदय से लेकर अगले दिन के सूर्योदय तक 24 घ्ंाटे की अवधि का  माना जाता है।

 आज के वर्तमान संदर्भ में निर्जला एकादशी का महत्व एवं उपाय

यह व्रत वर्तमान व्यवस्था जिसमें आने वाले समय में जल की कमी होने वाली है, उसके आपात काल को सहने का प्रशिक्षण देता है और आपको कई आपात परिस्थितियों में जल के बिना रहने की क्षमता भी प्रदान करता है। हमारे सैनिक कई ऐसी आपात स्थिति में 48 डिग्री तापमान में फंस जाते हैं, यदि उनकी कठोर   ट्र्ेनिंग न हो तो वे देश की रक्षा नहीं कर पाएंगे। इसी लिए यह व्रत हमें किसी भी ऐसी अप्रत्याशित आपात स्थिति से जूझने का साहस प्रदान करता है। मई जून की गर्मी में ही यह व्रत आपकी सही परीक्षा लेता है और आपकी शारीरिक क्षमता का मूल्यांकन करता है कि क्या आप कल को पानी की कमी झेल पाएंगे। राजस्थान में आज भी 200 फुट गहरे कुएं से महिलाएं केवल एक घड़ा पानी लेने के लिए कई किलोमीटर का सफर कर रही हैं।

इस साल तो प्रवासी मजदूर तपती गर्मी में, परिवार के छोटे छोटे बच्चों के साथ पैदल चलते रहे। कुछ लोगों एवं संस्थाओं ने उनकी खाने पीने की व्यवस्था को संभाला। परंतु हमारा पूर्ण कोरोना काल लगभग ऐसा रहने की संभावना है। अतः हमारे धर्म में रोज ही कोई न कोई पर्व , त्योहार मनाया जाता है और सभी में दान की व्यवस्था है। आज आवश्यकता है बदलते संदर्भ में दान की वस्तुओं तथा उसकी पात्रता को समझने की। 

निर्जला एकादशी के मर्म को समझते हुए, हम अपने दान के स्टाइल को बदलें। लॉक डाउन के नियमों का पालन करते हुए केवल पानी की बंद सेनेटाइज्ड बोतलें, जूस , फल आदि से  केवल जरुरत मंदो की ही सहायता करें। शरबत का पानी या चना ,हलवा हाथों में लेकर अति उत्साहित होकर कारों के आगे न कूदें क्योंकि जो एयरकंडीशंड कार में जा रहा है, उसके पास पानी की बोतल है। यह सामान यात्रा कर रहे श्रमिकों को पहुचाएं न कि संपन्न लोंगों के लिए सड़कों पर  छबील का टैंट लगा कर अपना व दूसरों का समय व धन बरबाद करें। इस दिन आप लोगंों को सेनेटाइजर, मास्क, ग्लव्ज, खाद्य सामग्री  पानी की बंद बोतलें जूस आदि बांट सकते हैं। सीनियर सिटीजन्स जो अकेले हैं उनका हालचाल पूछ कर दवाइयां दे सकते हैं। कोरोना से लड़ रहे योद्धाओं, डाक्टरों, पुलिसकर्मियों, अन्य सहकर्मियों के परिवारों की उनकी आवश्यकतानुसार मदद कर सकते हैं। 

अक्सर परंपरागत दानों में निर्जला एकादशी पर, पानी का घड़ा, पंखा, खरबूजा , तिल आदि को ब्राहम्णों में बांटने की व्यवस्था है। मंदिर बंद हैं। जो विद्वान मंदिरों के वेतन, दान दक्षिणा , पूजा पाठ, अनुष्ठानों , कर्मकांडों पर आश्रित थे , उनकी आचश्यकतानुसार सहायता करने का यह सुअवसर है।

आधुनिक युग में गर्मी से स्वयं बचने और दूसरों को भी बचाने के लिए आप पर्यावरण को और सुदृढ़ बनाने के लिए निर्जला एकादशी पर सार्वजनिक स्थानों पर प्याउ लगवाएं, वाटर कूलर की व्यवस्था करें, निर्धनों को खरबूजे, तरबूज जैसे अधिक जल वाले फल दें। दूध , लस्सी, आईसक्रीम, कोल्ड ड्रिंक, जूस आदि की सार्वजनिक व्यवस्था पूरी गर्मी के महीनों तक करें। फल व छायादार वृक्ष , औषधीय पौधे  लगाएं। जहां जनसाधारण को आवश्यकता हो अपनी क्षमतानुसार या चंदा एकत्रित करके एयर कंडीशनर , पंखे ,कूलर आदि का दान करें ।

यह व्रत हमारे देश की संस्कृति का प्रतिनिधित्व करता है जहां कहा गया है- सर्वे संतु सुखिना...तथा  सरबत दा भला। विश्व का कल्याण हो प्राणियों में सद्भावना हो । समाज का कमजोर वर्ग असहाय न रह जाए, सभी सुखी रहें , निरोगी रहें। एक दूसरे के प्रति समाज में समर्पण की भावना रहे , एक दूसरे की  सहायता को तत्पर रहें। सिख समुदाय ऐसी जल की छबीलें कई अवसर पर लगा कर भारतीय दर्शन को आगे बढ़ाता है और भारत में ही नहीं अपितु विश्व में सरबत दा भला की फिलासफी का प्रतिनिधित्व करता है। ऐसे पर्वों को सामूहिक रुप से मनाना आज के संदर्भ में और भी महत्वपूर्ण एवं समय की मांग हो गया है। आइये सभी भारतवासी इस व्रत को मनाएं और जल बचाने का प्रयास करें। जल है तो कल है का नारा ही निर्जला एकादशी का संदेश है।

निर्जला एकादशी मंगलवारए जून 2, 2020 को

एकादशी तिथि प्रारम्भ -जून 01, 2020 को 14:57 पी एम बजे

एकादशी तिथि समाप्त - जून 02, 2020 को 12:04 पी एम बजे

3 जून को , पारण ;व्रत तोड़ने का  समय - 05:23 ए एम से 08:10 ए एम

आज के दिन यह व्रत बिना जल पिए रखा जाता है ,इस लिए इसे निर्जला एकादशी कहा गया है। इस एकादशी का प्रारंभ महाभारत काल के एक संदर्भ से माना गया है जब  सर्वज्ञ वेदव्यास ने पांडवों को धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष देने वाले व्रत का संकल्प कराया तो भीम ने कहा कि आप तो 24 एकादशियों का व्रत रखने का संकलप करवा रहे हैं, मैं तो एक दिन भी भूखा नहीं रह सकता। पितामह ने समस्या का निदान करते हुए कहा कि आप निर्जला नामक एकादशी का व्रत रखो। इससे समस्त एकादशियों के व्रत का फल प्राप्त होगा। तभी से हिंदू धर्म में यह व्रत महत्वपूर्ण स्थान रखता है। इस एकादशी को भीमसेनी एकादशी भी तभी से कहा जाने लगा। इस दिन मान्यता है कि जो व्यक्ति स्वयं प्यासा रहकर दूसरों को जल पिलाएगा वह धन्य कहलाएगा।यह व्रत पति-पत्नी, नर नारी कोई भी किसी भी आयु का प्राणी रख सकता है । इस दिन भगवान विश्णु की आराधना का विशेश महत्व है। 

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