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वायु सेना के माहिरों ने चीन की वायु शक्ति संबंधी किया विचार-विमर्श


चंडीगढ़ (अदिति): इस बार वर्चुअल तौर पर करवाए जा रहे मिलिट्री लिटरेचर फेस्टिवल के चौथे भाग के पहले दिन चीन की वायु शक्ति संबंधी व्यापक चर्चा की गई।

इस चर्चा का संचालन वायु सेना के पूर्व प्रमुख बी.एस. धनोआ ने किया। इस चर्चा में ए.वी.एम. अर्जुन सुब्रमण्यम, जीपी कैप्टन रवीन्द्र छतवाल और डॉ. मिंग-शिह शेन शामिल थे।

वायु सेना के पूर्व प्रमुख ने वायु सेना में बड़े हथियारों की भूमिका बारे विचार-विमर्श करके इस चर्चा की शुरुआत की।

उन्होंने चीन की सरहद के साथ लगते भारत के इलाके की झलक पेश की।

वायु सेना के पूर्व प्रमुख ने एयर बेस से लड़ाकू जहाज़ों की दूरी बारे बात की और कहा कि एक युद्ध में ईंधन को दोबारा भरने के लिए जहाज़ों को उनके बेस पर वापस आना महत्वपूर्ण होता है।

उन्होंने लड़ाकू जहाज़ों के साथ तय की गई दूरी और एयर बेसों के दरमियान दूरी की तुलना की।

बातचीत के दौरान तख़्तापलट की रणनीति, फैलाव वाली जगह से कार्य करने की योग्यता, स्क्वेड्रन की ताकत, लड़ाई का तजुर्बा, बेस का सामथ्र्य और हिमालय की महत्ता पर भी विचार विमर्श किया गया।

ताइवान के डॉक्टर मिंग-शिह शेन ने ज़मीनी हमला कर रहे बॉम्बरों और वायु हमले की शुरुआत करने में तोपखाने की महत्ता संबंधी रौशनी डाली।

उन्होंने चीन के वायु सामथ्र्य, सरहदी क्षेत्रों में नये वायु अड्डे स्थापित करने और कोविड -19 के कारण बड़े जहाजों के निर्माण में देरी बारे भी जानकारी दी। चीन की वायु सेना की अपमानजनक और रक्षात्मक रणनीतियों और ड्रोन की भूमिका, साईबर और इलेक्ट्रॉनिक इंटेलिजेंस भी इसकी बातचीत का हिस्सा थे।

दो किताबों के लेखक अर्जुन सुब्रमण्यम ने अपने निजी तजुर्बों के आधार पर भारत और चीन के टकराव की संभावना बारे बात की। उन्होंने जंग के दौरान वायु शक्ति की महत्ता, विघटनकारी रणनीतियों और ज़मीनी शक्ति की भूमिका बारे बात की।

जीपी कैप्टन रवीन्द्र छतवाल ने भारत के विरुद्ध युद्ध में चीन की सीमा, वायु क्षेत्रों की सहायता, ड्रोन के उत्पादन क्षेत्र, प्रीडेटर ड्रोन और यूएवी के क्षेत्र में नवीनता सम्बन्धी बातचीत की।





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