• globalnewsnetin

शिक्षा बुद्धिजीवियों द्वारा पाठ्यक्रम में की गई कटौती की आलोचना


चंडीगढ़ (अदिति) हरियाणा के शिक्षा जगत से जुड़े बुद्धिजीवियों ने केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड द्वारा 9वीं, 10वीं, 11वीं तथा 12वीं कक्षाओं के अनेक विषयों के पाठ्यक्रम में की गई कटौती की आलोचना की है। प्रांत के विभिन्न विश्वविद्यालयों, महाविद्यालयों तथा स्कूलों में पढ़ाने वाले शिक्षकों ने हरियाणा ज्ञान-विज्ञान समिति के माध्यम से यह प्रतिक्रिया करते हुए कहा है कि इन कक्षाओं के लिए मार्च 2021 में होने वाली परीक्षाओं में देश-भर के करोड़ों छात्र-छात्राएं अधकचरी समझ के साथ परीक्षा देंगे। इन विद्यार्थियों की समझ और ज्ञान दोनों ही कमज़ोर हो जाएंगे। इस कमज़ोरी का प्रभाव उनकी भविष्य की शिक्षा पर भी हमेशा बना रहेगा।

हरियाणा ज्ञान-विज्ञान समिति शिक्षकों, बुद्धिजीवियों, विद्यार्थियों तथा सामाजिक कार्यकर्ताओं का मंच है। शिक्षा से जुड़े प्रत्येक पहलू पर विचार करने का कार्य इस मंच द्वारा किया जाता है। समिति द्वारा केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड के पाठ्यक्रम में कटौती करने के कदम पर प्रतिक्रिया करते हुए तीखी आलोचना की गई है। समिति का कहना है कि भले ही बोर्ड ने राष्ट्रीय शिक्षा प्रशिक्षण तथा अनुसंधान परिषद से इस बारे में सुझाव लिए हैं लेकिन पाठ्यक्रम में कटौती का निर्णय केवल परीक्षा आयोजित करने के दबाव में ही लिया गया है।

केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड विद्यार्थियों को तनाव मुक्त करने की इतनी ही चिंता रखता है तो 9वीं और 11वीं कक्षाओं के विद्यार्थियों को तो परीक्षाओं से मुक्त कर ही सकता है। 10वीं और 12वीं कक्षा की परीक्षा का भी ढंग बदला जा सकता है। लेकिन शिक्षा के व्यापक उद्देश्य और छात्रों पर पड़ रहे मनोवैज्ञानिक दबाव की परवाह न कर के आनन-फानन में पाठ्यक्रम की कटौती जैसे लोकप्रिय तरीके अपनाना पूरी तरह से गलत है। समिति से जुड़े शिक्षा के जानकारों ने बताया कि समाज विज्ञान, प्राकृतिक विज्ञान, भाषा एवं साहित्य, सभी विषयों में ऐसे बदलाव किए गए हैं जिनसे वैज्ञानिक दृष्टिकोण तथा संवैधानिक मूल्यों की समझ कमज़ोर होने का अंदेशा पैदा होता है। कुछ बदलावों को उद्धृत करते हुए कहा गया कि 12वीं कक्षा के हिंदी अनिवार्य विषय से काव्य प्रखंड में सूर्यकांत त्रिपाठी निराला की बादल राग, आलोक धन्वा की पतंग, कुंवर नारायण की बात सीधी थी पर, उमाशंकर जोशी की बगुलों के पंख तथा गद्य खंड से विष्णु खरे द्वारा लिखित चार्ली चैपलिन यानी हम सब और हजारी प्रसाद द्विवेदी का शिरीष के फूल जैसी महत्त्वपूर्ण साहित्यिक कृतियां हटाई गई हैं।

हिंदी के एच्छिक विषय में से निराला, केदारनाथ सिंह, भीष्म साहनी, रामविलास शर्मा, हज़ारी प्रसाद द्विवेदी जैसे अंतरराष्ट्रीय ख्याति के साहित्यकारों की रचनाएं हटाई गई हैं। 12वीं कक्षा के जीव विज्ञान विषय की पाठ संख्या 7 को हटाया गया है जिसमें जीव विज्ञान के विकास, डार्विन के योगदान आदि विषयों को अलग कर दिया गया है जबकि पूरी दुनिया के वैज्ञानिक तथा शिक्षाविद मानते हैं कि डार्विन के विकासवाद सिद्धांत को जाने बिना मानव जाति के इतिहास, भूगोल तथा विकास को समझा ही नहीं जा सकता।

पर्यावरण संबंधी विषयों में वायु प्रदूषण, जल प्रदूषण के प्रभाव तथा समाधान जैसे महत्त्वपूर्ण पाठ हटाए गए हैं। इतिहास विषय से राज्य, ज़मींदार और किसान, अंग्रेजी काल का उपनिवेशवाद तथा ग्रामीण अर्थव्यवस्था संबंधी पाठ हटाए गए हैं। बंटवारे की समझ जैसा महत्त्वपूर्ण पाठ भी हटा दिया गया है।

बोर्ड ने एक ओर तो यह कहा है कि एक पाठ से दूसरे तक पहुंचने के लिए विद्यार्थियों को सिद्धांत समझने की ज़रूरत होती है और दूसरी ओर, इस महत्त्वपूर्ण बुनियादी बात को अध्यापकों के हवाले कर दिया गया है कि वे अगर ज़रूरी समझें तो उन पाठों का सारांश बता दें लेकिन परीक्षा की दृष्टि से इनका कोई महत्त्व नहीं होगा।

एक तरफ़ बोर्ड द्वारा परीक्षा को अंतिम कसौटी मान लिया गया है और दूसरी तरफ़ परीक्षा के लिए निर्धारित किए गए पाठ्यक्रम के अलावा भी कुछ ज़रूरी बातें समझने की बात भी कह दी गई है। इस प्रकार की समझ में न केवल विरोधाभास दिखाई देता है बल्कि लापरवाही-भरा रवैया भी नज़र आता है।


समिति का मानना है कि इस बदलाव के कारण करोड़ों विद्यार्थी बहुत ही ज़रूरी और महत्त्वपूर्ण सैद्धांतिक विषयों को समझने से पूरी तरह से वंचित हो जाएंगे, भले ही वे परीक्षा क्यों न पास कर लें। इसलिए हरियाणा ज्ञान-विज्ञान समिति इस निर्णय की आलोचना करती है और सी बी एस ई और शिक्षा मंत्रालय को इस पर पुनर्विचार करने के लिए पुरज़ोर सिफारिश करती है।


 Global Newsletter

  • Facebook
  • social-01-512
  • Twitter
  • LinkedIn
  • YouTube