असामान्य समय में एक सामान्य बजट

सीए फरहत मियाँ (चार्टर्ड एकाउंटेंट) केंद्रीय बजट 2021-22 चुनौतीपूर्ण समय के बीच पेश किया गया। अभूतपूर्व कोविड -19 महामारी, अर्थव्यवस्था की धीमी गति और सीमा पर चल रहे तनाव  के कारण यह  वित्तीय वर्ष को श्रीमती सीतारमण के शब्दों के अनुसार, “सुई जेनेरिस”(अपने आप में अनोखा) है। इस वर्ष के बजटीय आवंटन ने स्पष्ट रूप से संरचनात्मक सुधारों के साथ सरकार के जुनून, 'न्यूनतम सरकार अधिकतम शासन' की उसकी नीति और साथ ही विधानसभा चुनावों में उसकी चुनावी महत्वाकांक्षाओं को दर्शाया । बजट में सरकार द्वारा बुनियादी ढांचे को मजबूत करने विकास वित्त संस्थान का विकास, परिसंपत्ति मुद्रीकरण और पूंजीगत व्यय में वृद्धि का मार्ग चुना गया  । बैंकिंग, बीमा और वित्तीय क्षेत्रों में कई सुधार हुए। सार्वजनिक क्षेत्रों के बैंकों से स्ट्रेस्ड एसेट्स को खत्म करने का प्रयास, बीमा क्षेत्र में विदेशी निवेश (एफडीआई) की सीमा 49% से 74% बढ़ाना तथा पूंजीगत बाजारों से संबंधित क़ानूनों को एक तर्कसंगत एकल 'प्रतिभूति बाज़ार कोड' में समेकित करना मौजूदा सुधारवादी नीतियों का विस्तार है। अपनी रणनीतिक विनिवेश नीति में तेजी लाते हुए, सरकार ने 2 सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों और एक सामान्य बीमा कंपनी के निजीकरण का प्रस्ताव किया और 4 रणनीतिक क्षेत्रों में न्यूनतम केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र उद्यमों (सीपीएसई) को बनाए रखते हुए संरचित तरीके से लगभग सभी सीपीएसई के विनिवेश की योजना बनाई। यद्यपि इस तरह के निजीकरण से दक्षता और वस्तुओं / सेवाओं की गुणवत्ता में सुधार होता है, लेकिन निजी कंपनियों द्वारा आपस में मिलकर अपने लाभ के लिए बाज़ारी कीमतों में बाज़ारी कीमतों में हेरफेर करने का जोखिम हमेशा रहता है। इसलिए सरकार को अब कड़े एंटी -ट्रस्ट नियम बनाकर और  भी सतर्कता दिखानी होगी। इसी प्रकार में वर्ष 2021-22 के दौरान एलआईसी का एक आईपीओ भी प्रस्तावित किया गया था प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष कर कानूनों में कई सूक्ष्म बदलाव किये गए। हालांकि महामारी के कारण सरकारी राजस्व पर भारी दबाव होने के बावजूद अतिरिक्त कर या उपकर नहीं लगाया जाना सबसे बड़ी राहत रही ।आयकर स्लैब या बचत योजनाओं के दायरे में में कोई बदलाव नहीं किया गया है लेकिन वरिष्ठ नागरिकों (75 वर्ष से अधिक आयु) पर आयकर अनुपालन में ढील, आयकर रिटर्न में ज़्यादा जानकारी पहले से भरी होना तथा आयकर विवाद की अपील में पारदर्शिता बढ़ाने के लिए अवैयक्तिक न्यायाधिकरण (ITAT) का प्रस्ताव जैसे  अनेक कदम उठाए गए हैं। डिजिटल लेनदेन को प्रोत्साहित करने और अनुपालन बोझ को कम करने के लिए, उन व्यवसायों की  टैक्स ऑडिट छूट सीमा को बढ़ाकर रु10 करोड़ रूपये कर दिया गया है जो अपने 95% लेनदेन डिजिटल रूप से करते हैं। टैक्स असेसमेंट के केस को दोबारा खोले जाने की अवधि को 6 साल से घटाकर 3 साल करने का भी ऐलान किया गया है(हालाँकि गंभीर मामलों में भी जहां एक साल में 50 लाख रुपये या उससे अधिक की टैक्स चोरी के सबूत मिलते हैं, उन्हें भी 10 साल में दोबारा खोला जा सकेगा) । इसी तरह, शिक्षण संस्थानों और अस्पतालों को चलाने वाले छोटे धर्मार्थ ट्रस्टों की कर छूट की सीमा बढ़ाकर 5 करोड़ रूपये की गयी है । होम लोन के ब्याज पर मिलने वाली छूट तथा स्टार्ट-अप के लिए विभिन्न प्रोत्साहनों को एक साल और बढ़ाया गया है। जीएसटी कानून में एक बड़ा बदलाव, पेशेवर द्वारा अनिवार्य जीएसटी ऑडिट की आवश्यकता को हटाने का है। श्रीमती सीतारमण ने जीएसटी कानून को सरल बनाने के लिए सरकार द्वारा उठाए गए कई प्रयासों की प्रशंसा की। हालांकि, अभी भी जीएसटी में कई चुनौतियों हल किया जाना बाकी है ताकि नकली इनपुट टैक्स क्रेडिट पर अंकुश लगाने के साथ-साथ वास्तविक व्यवसायों को इनपुट के सहज प्रवाह की सुविधा मिलती रहे । पिछले सभी बजटों की तरह यह बजट सभी समस्याओं का रामबाण नहीं है। इसका उद्देश्य अर्थव्यवस्था को संरचनात्मक रूप से मजबूत करना है हालाँकि इसके समाधान तत्काल बेरोजगारी संकटों को हल करने और निजी खपत बढ़ाने के लिए पर्याप्त नहीं है। कुल मिलाकर इस बजट को आगामी वर्षों में उच्च विकास दर हासिल करने और कोविड महामारी के कारण आई मंदी से उबरने के प्रयास के रूप में देखा जा सकता है ।

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